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संघ न होता तो न जाने कौन-सी मस्जिद में हिन्दू बांग देे रहे होते


रामेश्वर सिंह राजपुरोहित कानोडिया

बाड़मेर।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना परम पूज्य डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने सन 1925 में की थी। जिसका मूल उद्देश्य भारत को उसकी अपनी सभ्यता के परिप्रेक्ष्य में पहचान प्रदान करना है और इसको अंजाम देने के लिए उन्होंने जिस तरीके को स्थापित किया वह राजनीतिक न होकर सामाजिक और सांस्कृतिक है। इसलिए संघ का देश की राजनीति में कितना ही प्रभाव क्यों न हो उसका मूल चरित्र सामाजिक और सांस्कृतिक बना रहा है। देश की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव उसके द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव को एक परिणाम के रूप में देखा जाना चाहिए। 
संघ ने देश को विकास व संस्कार के रास्ते पर तेज गति से आगे बढ़ने में अहम भूमिका निभाई है। संघ के बगैर ये सब बदलाव असंभव था। इसके पीछे हजारों वो लोग जिन्होंने अपने घर परिवार छोड़ कर देश व समाज के लिए संघ में प्रचारक के रूप में जुड़ अपना बलिदान दिया। प्रचारक बंधुओ ने जो त्याग व तपस्या की है उसका परिणाम बहुत ही सकारात्मक व उत्कृष्ट निकला है। समाज के हर वर्ग कोई अगर आज साथ लेकर चलने में सफल है तो केवल संघ है। संघ ने युवाओ को एक सोच ही नही दी बल्कि उनको कार्य करने की पद्धति भी दी है। इससे युवाओ को अपने कार्म को निर्वहन करने में मदद मिली है। समाज को एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ सही दिशा देने का काम भी संघ ने किया है। खोते राष्ट्रवाद को प्रबल शक्ति संघ ने दी है।
संघ के कार्य हर वर्ग को मन को भा रहा है। संघ ने हमेशा देश व समाज को हर विपरीत स्थिति से निकलकर सर्वदा समाज के हित में काम किया है। संघ के कारण ही आज देश सिर उठाकर चल रहा है। अगर संघ जैसी हनुमान शक्ति भारत जैसे देश के पास नही होती तो ये सामर्थ्य व शक्ति भारत शायद आज नही पा सकता था। संघ की शाखाओंं से तैयार युवा इमानदारी से हर कार्य में व्यस्त है। इसके कारण भ्रष्टाचार के यूपीए के दौरान में भी भारत कुछ बचा कुच रहा। वरना देश कब का बिक जाता। संघ के कारण भारत को केवट रूपी चरित्रवान युवा पीढ़ी मिली। जिसने घन-घोर भ्रष्टाचार के दौरान का चरितार्थ के साथ संघर्ष किया।
भारत को आजादी मिलने के बाद से तत्कालीन प्रधानमंत्री की सह पर हिन्दूओं के साथ तुष्टिकरण का दौर दिन दुगुना व रात चौगुना शुरू हो गया। हिन्दू धर्म व उसकी हर व्यवस्था को नीचे दिखाने का कार्य प्रायोजित तरीके से चल रहा था। इस चीज को मैं स्वयं ने भी अनुभव की है। वही धर्म परिवर्तन का दौर अपनी तेजतम गति से फंडिंग के माध्यम से चल रही थी। लोग लगभग हिन्दू धर्म की व्यवस्था को अपनाने के बाद अपने आप को नीचा व हय दृष्टि से देखा पा रहे थे। ऐसे में बिना किसी भी लकीर को छोटा किए संघ ने केवल अपनी लकीर को बड़ा करते हुए देश व समाज में ऊर्जा का संचार किया। लोगो की सोच व विचार को सकारात्मक शक्ति दी। इस कारण जो शेष बचे है वे हिन्दू रहे। वरना किसी मस्जिद में आज बांक दे रहे होते।
संघ ने कुछ वर्ष पूर्व तक राजनीति को निष्प्रभावी किया बल्कि वैकल्पिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक दृष्टिकोणों को बढ़ती हुई स्वीकृति के साथ स्थापित करने का काम किया। भारत में वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता कोई नई बात नहीं है। जिन्हें यह परिवर्तन अचानक और अप्रत्याशित लगता है वे सम्भवतः देश के भीतर दशकों से हो रहे ज़मीनी स्तर के बदलाव को न समझ पाए हैं और न ही आज भी समझने की कोशिश कर रहे हैं। संघ के प्रभाव के पीछे बीस के दशक से ही पीढ़ी दर पीढ़ी युवाओं का आकर्षण रहा है। आज इसे भारत के युवाओं का भारी समर्थन मिला हुआ है। स्वभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि कथित रूप से प्रगतिशीलता, बदलाव और क्रांति की बात करने वाली विचारधाराएं हाशिए पर क्यों चली गईं ? और जिन्हें वे पश्चिम के बुद्धिजीवियों के साथ गठबंधन बनाकर प्रतिक्रियावादी, फासीवादी, साम्प्रदायिक और यथास्थितिवादी कहते थे वह विचारधारा क्यों आज अपना प्रभुत्व बनाने में सफल रही है?

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